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Monday, September 27, 2010

"पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुअराओ तो कोई बात बने,


"पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुअराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा सर उठाओ तो कोई बात बने"

Wednesday, September 22, 2010

ये इश्क नहीं घर खाला

ये इश्क नहीं घर खाला का उसको भी समझना लाजिम है |
हर नक्शे कदम पर दिलबर के इस सर को झुकाना पड़ता है ||

"ना दिल से होता है न दिमाग से होता है

"ना दिल से होता है न दिमाग से होता है
यह मिलन तो सिर्फ उसकी रजा से होता है
मिलन की ये खुशबू साँसों में बस गयी है
'इश्क' को यह अहसास और गुदगुदाता है"

मेरी प्राण प्रिया क्या कहें तुमको


मेरी प्राण प्रिया क्या कहें तुमको
कि क्या हो तुम
कह देंगे अगर प्राण हो तुम
तो प्राणों के बाद क्या तेरा साथ न होगा
तुम्ही बताओ न दिलरुबा
तुम्हारी यादो का क्या हमे ख्याल न होगा
कह देंगे अगर दिल हो तुम
तो क्या धड़कन बंद होने के बाद तेरा एहसास न होगा
तुम्ही बताओ न सजनी
तुम्हारी मुस्कराहट का हमे एहसास न होगा
अब तुम्ही बताओ न
क्या हो तुम हमारी
क्यों याद आती हो इतना
क्यों तडपाती हो इतना

Tuesday, September 21, 2010

मैं चातक हुँ, तू बादल है

मैं चातक हुँ, तू बादल है
मैं लोचन हुँ, तू काजल है
मैं आँसू हुँ, तू आँचल है
मैं प्यासा, तू गँगाजल है.
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड मस्ताना कह ले,
तू चाहे रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते अपना भी होश भुला बैठा.
जिसने मेरा परिचय पूछा, मैं तेरा नाम बता बैठा...

दिल में गुलशन आँख में सपना सुहाना रख

दिल में गुलशन आँख में सपना सुहाना रख
आसमां की डालियों पर आशियाना रख

हर कदम पर एक मुशिकल ज़िंदगी का नाम
फिर से मिलने का मगर कोई बहाना रख

अर्थ में भर अर्थ की अभिव्यंजना का अर्थ
शब्द की सीमा के आगे भी निशाना रख

कफस का ये द्वार टूटेगा नही सच है मगर
हौसला रख अपना ये पर फड़फड़ाना रख

बेसुरी होने लगी है हर सुबह, हर शाम
अपनी सांसों में मगर कोई तराना रख

तेरे जाने पर जिसे दुहराये ये महफिल
वक़्त की आंखों में इक ऐसा फसाना रख

कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?

कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
तो वो बोले

खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

आज क इस दोर मैं मोहबत हो जाये किसी से

आज क इस दोर मैं मोहबत हो जाये किसी से
बेतहर यही होगा जहर पी ले वो खुसी से
पहले वादों मैं मारते थे फिर इंतेजार मैं
बड़ी संगीन सजा देते थे लोग प्यार मैं
एक बार उन पे मरकर बे मोत मर गए है
देकर गम को वो दीवाना कर गए है
तमशा बन गया है खुद भरे बाज़ार मैं
ऐसी सजा मिली है मुछको देखो प्यार मैं
हमने बफा का आज ऐसा फरेब खाया है
देकर झूटी तस्श्हली दिल को बहुत समझ्आया है
इश्क ने ला खडा कर दिया है इस कगार मैं
दीवना बना फिरता हु इस सनसाहर मैं
आज भी आंखे लगी है तेरे इंतेजार मैं

बड़ी ही सगीन सजा देते है लोग प्यार मैं

बेहतर नही होता

बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है
क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता!!!

मत इंतज़ार कराओ हमे इतना कि वक़्त के फैसले पर अफ़सोस हो जाये

मत इंतज़ार कराओ हमे इतना कि वक़्त के फैसले पर अफ़सोस हो जाये
क्या पता कल तुम लौटकर आओ और हम खामोश हो जाएँ

दूरियों से फर्क पड़ता नहीं बात तो दिलों कि नज़दीकियों से होती है
दोस्ती तो कुछ आप जैसो से है वरना मुलाकात तो जाने कितनों से होती है

दिल से खेलना हमे आता नहीं इसलिये इश्क की बाजी हम हार गए
शायद मेरी जिन्दगी से बहुत प्यार था उन्हें इसलिये मुझे जिंदा ही मार गए

मना लूँगा आपको रुठकर तो देखो, जोड़ लूँगा आपको टूटकर तो देखो। नादाँ हूँ पर इतना भी नहीं , थाम लूँगा आपको छूट कर तो देखो।

लोग मोहब्बत को खुदा का नाम देते है, कोई करता है तो इल्जाम देते है।
कहते है पत्थर दिल रोया नही करते, और पत्थर के रोने को झरने का नाम देते है।

भीगी आँखों से मुस्कराने में मज़ा और है, हसते हँसते पलके भीगने में मज़ा और है,
बात कहके तो कोई भी समझलेता है, पर खामोशी कोई समझे तो मज़ा और है...!

मुस्कराना ही ख़ुशी नहीं होती, उम्र बिताना ही ज़िन्दगी नहीं होती,

Sunday, July 4, 2010

जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी

जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (१)

दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं
वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं
वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते
प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं

एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती
हँसी धरती मोतियों के बीज बोती
सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता
चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती

एक अंकुर फूटकर बोला कि मैं हारा नहीं हूँ
एक उल्का-पिण्ड हूँ, तारा नहीं हूँ
मृत्यु पर जीवन-विजय उदघोष करता
मैं अमर ललकार हूँ, चारा नहीं हूँ

लाल कोंपल से गयी भर गोद धरती की
कि लौ थी जगमगाई,
लाल दीपों की प्रगति-परम्परा थी मुस्कराई,
गीत, सोहर, लोरियाँ जो भी कहो तुम
गोद कलियों से भरे लोनी-लता झुक झूम गायी
और उस दिन ही किसी मनु ने अमा की चीर छाती
मानवी के स्नेह में बाती डुबायी
जो जली ऐसी कि बुझने की बुझायी-
बुझ गयी, शरमा गयी, नत थरथरायी

और जीवन की बही धारा जलाती दीप सस्वर
आग-पानी पर जली-मचली पिघलने लगे पत्थर

जल उठे घर, जल उठे वन
जल उठे तन, जल उठे मन
जल उठा अम्बर सनातन
जल उठा अंबुधि मगन-मन
और उस दिन चल पड़े थे साथ उन्चासों प्रभंजन
और उस दिन घिर बरसते साथ उन्चासों प्रलय-घन

अंधड़ों में वेग भरते वज्र बरबस टूट पड़ते
धकधकाते धूमकेतों की बिखर जाती चिनगियाँ
रौद्र घन की गड़गड़ाहट कड़कड़ाती थी बिजलियाँ

और शिशु लौ को कहीं साया न था, सम्बल नहीं था
घर न थे, छप्पर न थे, अंचल नहीं था
हर तरफ़ तूफ़ान अन्धड़ के बगूले
सृष्टि नंगी थी अभी बल्कल नहीं था

सनसनाता जब प्रभंजन लौ ध्वजा-सी फरफराती
घनघनाते घन कि दुगुणित वेदना थी मुस्कराती
जब झपेटों से कभी झुक कर स्वयं के चरण छूती
एक लोच कमान की तारीकियों को चीर जाती

बिजलियों से जो कभी झिपती नहीं थी
प्रबल उल्कापात से छिपती नहीं थी
दानवी तम से अकड़ती होड़ लेती
मानवी लौ थी कि जो बुझती नहीं थी
क्योंकि उसको शक्ति धरती से मिली थी
हर कली जिस हवा पानी में खिली थी

सहनशीलता, मूकतम जिसकी अतल गहराइयों में
आह की गोड़ी निगोड़ी खाइयों में
स्नेह का सोता बहा करता निरंतर
बीज धँसता ही चला जाता जहाँ जड़ मूल बनकर
गोद में जिसके पला करता विधाता विवश बनकर

धात्री है वह सृजन के पंथ से हटती नहीं है
व्यर्थ के शिकवे प्रलय-संहार के रटती नहीं है
जानती है वह कि मिट्टी तो कभी मिटती नहीं है
आग उसकी ही निरंतर हर हृदय में जल रही है

स्वर्ण दीपों की सजीव परम्परा-सी चल रही है
हर अमा में, हर ग्रहन की ध्वंसपूर्ण विभीषिका में
एक कसकन, एक धड़कन, बार-बार मचल रही है
बर्फ की छाती पिघलकर गल रही है, ढल रही है

आज भी तूफान आता सरसराता
आज भी ब्रह्माण्ड फटता थरथराता
आज भी भूचाल उठते, क़हर ढहता
आज भी ज्वालामुखी लावा उगलता

एक क्षण लगता की जीत गया अँधेरा
एक क्षण लगता कि हार गया सवेरा
सूर्य, शशि, नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह सभी को
ग्रस रहा विकराल तम का घोर घेरा

किंतु चुंबक लौह में फिर पकड़ होती
दो दिलों में, धमनियों में रगड़ होती
वासना की रूई जर्जर बी़च में ही
उसी लौ की एक चिनगी पकड़ लेती

और पौ फटती, छिटक जाता उजाला
लाल हो जाता क्षितिज का वदन काला
देखते सब, अंध कोटर, गहन गह्वर के तले पाताल की मोटी तहों को
एक नन्ही किरण की पैनी अनी ने छेद डाला,
मैं सुनाता हूँ तुम्हें जिसकी कहानी
बात उतनी ही नयी है, हो चुकी जितनी पुरानी
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी


कफन फाड़कर मुर्दा बोला

कफन फाड़कर मुर्दा बोला

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इन्जन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अन्जाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया ।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण !

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला !
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।


आज तुम मेरे लिए हो

आज तुम मेरे लिए हो

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।


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